खुसूर-फुसूर
भूमिपुत्रों ने शहरियों की जेब भी बचाई…
महाआयोजन क्षेत्र में बडे पैमाने पर सीमेंट कांक्रीटीकरण की तैयारी हो चुकी थी। इसे लेकर भूमिपुत्र मैदान में कुदे और अंतत: योजना निरस्त की गई। इस पूरे मामले पर आम शहरी जिसका इसमें सीधा-सीधा भला हुआ है कहीं भी सामने नहीं आया है। कुल जमा देखा जाए तो आम शहरी की जेब को भूमिपुत्रों ने सीधे तौर पर बचाया है। शहर में अधिकांश सब्जी महाआयोजन के इन्ही भूमिपुत्रों द्वारा पहुंचाई जाती है। वे 11 साल इस भूमि पर खेती करते हैं और कई किस्म के अनाज सहित सब्जी की खेती भी साथ में करते हैं जिससे उनका अच्छा खासा खर्च निकलता है। शहर के पास होने से यह सब्जी बहुत ज्यादा महंगी नहीं हो पाती है। यहां तक की इंदौर जैसे शहरों के भाव भी नहीं हो पाती है। इसमें परिवहन का बडा व्यय बचता है तो इससे सब्जी के दाम भी नियंत्रण में रहते हैं। यही सब्जी सीधे तौर पर कृषक एवं उनके परिजन आसपास के शहरी क्षेत्र में बेचने निकल पडते हैं और उससे अच्छी खासी आय अर्जित कर लेते हैं। यही कारण है कि हमारे यहां अन्य शहरों की अपेक्षा सब्जी के दाम बहुत ज्यादा नहीं हैं। सामान्य सीजन की सब्जी यहां नियंत्रित दाम से ही मिल जाती है। इसके अलावा सब्जी हमारे यहां आयात भी होती है। पालक,मैथी सहित हरी सब्जी तो आसपास से ही आती है। आयात करने की स्थिति में यह सब्जी सीधे तौर पर ताजी नहीं मिल सकती है। अच्छी खासी आवक महाआयोजन के क्षेत्र से होती है। इसके अलावा जिले के सब्जी उत्पादक किसान भी उसमें अच्छा खासा सहयोग करते हैं। मूल रूप से बाहर से आने वाली सब्जी परिवहन सहित अन्य व्यय के चलते महंगी ही आम शहरी को मिलती है। स्थानीय उत्पादन होने से आम शहरी को ही इसका सीधा लाभ मिलता है। खुसूर-फुसूर है कि भूमि पुत्र जागृत होकर अगर योजना निरस्त नहीं करवाते तो आम शहरी की जेब पर सीधे –सीधे फटका लगने का काम इस सीजन से शुरू हो चुका होता। अभी तो फसल में गेहुं एवं चना सहित अन्य उत्पादन से भी जिला लाभाविंत होगा साथ ही उपज के विक्रय से मंडी को भी 2 प्रतिशत टैक्स मिलेगा ।